Anubha Prasad

क्या होता है जब प्रोजेक्ट फ़ाइनैन्स, डेट-एक्विटी और कैश फ़्लो के पचड़ों में फंसे हुए एक बैंकर को इनसे इतर कुछ साहित्यिक करने की कसक सालने लगती है? उसकी रचनाधर्मिता अचानक जाग जाती है? आजकल के ज़माने में कुछ यूँ होता है- साहित्य के कीड़े का काटा वह व्यक्ति, सोशल मीडिया के प्लैट्फ़ॉर्म पर अपने लेखन के नमूने डालने लगता है, और हर आधे घंटे पर मिलने वाले 'लाइक' और 'कॉमेंट' का जायज़ा लेने लगता है। कुछ ऐसा ही इस नाचीज़ के साथ हुआ। स्कूल, कॉलेज के दिनों में हिंदी-अंग्रेज़ी दोनों में रचनात्मक लेखन के लिए कई पुरस्कार मिले, लेकिन इंजिनीयरिंग और एम बी ए की पढ़ाई, बच्चों के भविष्यनिर्माण की चिन्ता और बैंकिंग की नौकरी में सिलसिला थम सा गया। फिर जब बच्चों ने अपने-अपने सपनों की तलाश में घोंसले को छोड़ कर उड़ान पकड़ी, तो एक बेचैनी के तहत कविताओं, ग़ज़लों और नज़्मों का सिलसिला शुरू हुआ और इनके लिए पहचान भी मिलनी शुरू हो गई। अंततः, रचनाधर्मिता को जगाए रखने का आत्मविश्वास कुछ हद तक वापस आया।

वैसे तो मेरी ग़ज़लों, नज़्मों और कविताओं में बीते दिनों की यादों, जिसे आप नॉस्टैल्जिया कह सकते हैं, की कसक साफ़ है; लेकिन इनमें ग़ज़ल की सबसे बड़ी पहचान, यानी जज़्बा-ए-आशिक़ी की भी कुछ झलक है। लेकिन इन सबसे बढ़कर, सामाजिक संवेदनाऒं और सरोकारों, और उससे जन्मी छटपटाहट का स्वर मुखर है। समाज में हाशिए पर धकेले गए जनसाधारण की चीख़ को भी शब्दों में सहेजने का प्रयास है। एक औरत होने की पीड़ा और 'अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो' की ज़िद भी शामिल है। भाषा में अपनी गंगा-जमनी तहज़ीब का फ़्लेवर है जो कैफ़ी, साहिर, गुलज़ार और दुष्यंत कुमार का विरसा है।

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ज़मीर ज़िंदा है.....

मुख्यतः ज़िंदगी के सरोकारों को टटोलती इस किताब का शीर्षक है 'ज़मीर ज़िंदा है'; शायद ख़ुद को यह विश्वास दिलाने के लिये कि आजकल की इस दौड़ती भागती तथा आत्मकेंद्रित दुनिया में भी ज़मीर नाम की चीज़ पाई जाती है, ख़ासकर हम जैसे साधारण इंसानों में भी। क़रीब साठ कविताओं/नज़्मों/ग़ज़लों की पुस्तक है जिसमें तीन खंड हैं। तीनों के नाम उर्दू के नामचीन शायरों की मशहूर पंक्तियों से प्रभावित हैं- 1.यादे-माज़ी अज़ाब है या रब..... याने नोस्टाल्जिया 2. इक आग का दरिया है ....... याने इश्क़ विश्क़, तथा 3. और भी ग़म हैं ज़माने में....... याने सरोकार भाषा में उर्दू शब्दों का खुलकर प्रयोग किया है क्योंकि नज़्मों और ग़ज़लों के सहज प्रवाह में उर्दू फ़िट बैठती है, लेकिन ये शब्द अमूमन ऐसे नहीं हैं जिनके लिए आपको फ़ुटनोट देखने की ज़रूरत पड़े। आगे, अंतिम निर्णय आप सुधि पाठकों के हाथ में है। आपको निराशा नहीं होगी, इसी विश्वास के साथ ये पहली कोशिश आप सबकी नज़र है!

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Who is this book for?

Anyone who is interested in Hindi-Urdu poetry with a flavour of our composite culture, poetry which dwells deep down the conscience. Anyone who is nostalgic about the days bygone, when lives were simpler, yet more meaningful. Anyone who is pained by strife and mistrust, anyone who has a hope and a vision for a future where humanity prevails!

Why are you writing it?

What happens when a banker-cum-project financier juggling with debt, equity, financial modelling and ROIs suddenly re-discovers her long lost penchant for poetry? My journey of self discovery for the last six odd months culminates in gazals and nazms which haunt with the moorings of nostalgia, which meander through love in the troubled times, and most importantly; which try to stoke a fire within on issues affecting our lives and times- the communal divide, the agony of belonging to the so called 'lesser' sex which is shown her place time and again, the rampant rumour mongering of the 'fake news' variety, the helplessness of a farmer driven to suicide and so on. The raison d'être of this book- passion for certain universal values, hopes for better days for the coming generations, to rekindle interest in poetry with a purpose! The language- Hindi with a fair sprinkling of Urdu words to go effortlessly with the flow of the genre but the kinds that do not drive you to the footnotes. Hope these baby steps taken at the wrong side of forties find favour with poetry lovers!

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