Autho Publication
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by

Nandita Basu

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Chapter 3 :

मकान (नज्म)


मकान की चारदीवारी में रंग लगाया

कुछ तस्वीरों से दीवारों को सजाया ।

 

सीमेंट के टुकड़ों से झांकती कुछ ईंटो को

मरम्मत करवा के पैबंद सा लगवाया ।

 

कुछ नकली फूलों के गुलदस्ते कुछ सूखते फूल

पुरानी कालीन को नए तरीके से बिछाया ।

 

टूटते सोफे के पायों में बेदर्दी से कुछ कीलें ठोंकी

चद्दरों के सिलवटों से अपने तनावों को छिपाया  ।

 

धूल भरी मेज़ पर डाली कढ़ाई की हुई वो मेज़ पोश

जिसमें मां ने पहली बार कुछ काढ़ना सिखाया था  ।

 

एक दीवार में हमारी वो शिमला वाली तस्वीर लगाई

जिसमें मैंने कत्थई रंग वाला वही शॉल पहना था ।

 

खिलखिलाना मेरा कितना बचकाना लग रहा था

और बालों में वो पहाड़ी जंगली फूल उफ्फ  ।

 

कोशिश की थी सफेद फैन से धूल साफ हो जाए

आलमरियों से पुराने कपड़ों को धूप दिखा आएं ।

पर क्या रिश्ता में पड़ी धूल साफ हो जाती है

बेरंग हुए जज़्बातों में नई जान आ जाती है ।

 

बहुत कोशिश की थी कुछ नयापन ले आए

बासी सी हो चली ज़िंदगी में ताजगी भर जाएं ।

 

कितनी जद्दोजहद की थी छोटे से अपने आशियाने को

जज़्बातों से भरा एक खूबसूरत घर बना जाएं ।

 

जहां हर सांस खिलखिलाती हो जहां हर सुबह

एक नई उम्मीद की नई रोशनी लाती हो ।

 

पर काश रिश्तों को भी मरम्मत कर पाते

थोड़ा जोड़ -तोड़ के उसमें नयापन ला पाते ।

 

कोशिशें अब भी जारी है है हमने अभी हार नहीं मानी है

देखते हैं ईंट पत्थरों के मकान को घर कब कह पायेंगे ।