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Anand Usha Borkar

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Chapter 3 :

भाग 3

तारीख 06 अगस्त 2017, शाम 04 बजे "चाय...चाय......विराट अपनी जिन्दगी की कहानी सुना ही रहा था कि उनकी ट्रेन रायगढ़ स्टेशन पर रुक जाती है। एक 11 साल का बच्चा जिसके एक हाथ मे चाय की कैटली थी और दूसरे हाथ में चाय के कप, "चाय....चाय" चिल्लता हुआ सौम्या के पास आता है और कहता है "मैम चाय..." सौम्या कुुछ बोलती उससे पहले ही विराट ने कहा "हमारा स्टेशन आ गया, हमे यही उतरना है। सौम्या और विराट ट्रेन से उतरकर स्टेशन के बाहर खड़े हो जाते है। वही पर सामने बस स्टेण्ड था । "आप यही रूकिये, मैं बस की टिकट लेकर आता हूँ।" विराट ने कहा। "क्या बस की टिकट!" सौम्या ने चौंककर कहा। "हाँ बस की टिकट, दबकन जाने के लिए हमे बस पकड़नी होगी और फिर वहाँ से काची जंगल का सफर पैदल तय करना पड़ेगा क्योंकि उस रास्ते से कोई बस नहीं जाती ।" "मेरा कहने का मतलब यह नहीं था, मेरा मतलब यह था कि तुम तो हीरे की कम्पनी के मालिक थे न और तुम्हारे पास फरारी और कई कार भी थी, तो हम बस से क्यो जाएंगे?" 'सौम्या जी...अभी तो आपने मेरी जिन्दगी का आधा किस्सा सुना है पूरा सुनना बाकी है। अभी मेरी बेगानी प्रेम कहानी खत्म नहीं हुई है, आप चलिए मैं रास्ते में आपको सब बताता हूं ।" विराट और सौम्या बस में बैठ चुके थे। सौम्या खिड़की के पास बैठी हुई थी और विराट उसके बगल मे। खिड़कियों से हवाए बस के अंदर आ रही थी। जिस कारण सौम्या के चेहरे का आँख के पास का निशान, जिसे सौम्या हमेशा अपनी जुल्फो से ढक कर रखा करती थी, वह विराट को साफ-साफ नजर आ रहा था। विराट उसी निशान को घुरे जा रहा था। उसके मन में यही सवाल घूम रहा था कि इतने खुबसूरत चेहरे पर यह निशान कहाँ से आया? उस निशान को देखकर विराट बैचेन हुए जा रहा था, उससे रहा नहीं गया और उसने सौम्या से पुछ ही लिया "यदि आपको कोई परेशानी नहीं हो तो क्या आप मुझे बता सकती हो कि आपके चेहरे पर यह निशान कैसा है?" "आखिर तुमनें देख ही लिया।" सौम्या ने अपने चेहरे का निशान वापस अपनी जुल्फो से छुपाते हुए कहा। "कितनी भी कोशिश करो अपना अतीत भुलाने की पर कुछ घाव ऐसे होते है जो आपको आपका अतीत याद दिला ही देते।" "अगर आपको कोई परेशानी है तो रहने दीजिए।" "नहीं इसमें परेशानी किस बात की पर पता नहीं सच्चाई जानने के बाद तुम मुझ पर भरोसा करोगे भी या नहीं? कही तुम यह न समझ बैठो की यह अंधी मेरी एंजल की मदद कैसे करेगी? इसे तो खुद मदद की जरूरत है।" "क्या कहा आपने अंधी... कौन अंधी..?" विराट ने चौंककर पूछा। "मैं अंधी और कौन अंधी। देखकर लगता नहीं है न कि जो लड़की अपने सब काम खुद कर लेती है यहां तक की प्रेत-आत्माओ का सामना भी कर लेती है, वह अंधी कैसे हो सकती है?" "हाँ, नहीं होता यकिन।" उस वक्त में 16 साल की थी और अपनी दादी के घर पंजाब गयी हुई थी । मम्मी, पापा और मेरा छोटा भाई (रिंकू) राजस्थान के दबकन में ही थे। मुझे गये हुए अभी 15 दिन ही हुए थे कि मम्मी और पापा का फोन आना बंद हो गया। पहले मम्मी-पापा रोज फोन किया करते थे पर अब एक हफ्ते से ज्यादा वक्त हो गया था, उनका कोई फोन नहीं आया था। मुझे और दादी को उनकी फिक्र होने लग गयी। इसलिए मैं, दादी और मामा जी के साथ दबकन आ गयी। जब हम हमारे बंगले पर पहुँचे तो देखा वहाँ पर न मम्मी थी, न पापा और न ही मेरा छोटा भाई, वहाँ पर कोई नहीं था। हमारा बंगला काची जगंल के अंदर था। हमारे बंगले के आस-पास कोई नहीं रहता था जिससे हम मम्मी-पापा और छोटे भाई के बारे में पूछ सके। हम लोग मम्मी-पापा और छोटे भाई को ढूंढ़ ही रहे थे कि मामा को जंगल के पास एक बड़े से पीपल के पेड़ के ऊपर मम्मी-पापा और छोटे भाई की उल्टी लटकी हुई लाशे मिली थी। हैरानी तो इस बात की थी कि उनके शरीर पर एक भी खरोच के निशान नहीं थे। पोस्टमार्टम रिपार्ट में भी कुछ पता नहीं चला था। डॉक्टर भी इस बात का पता नहीं लगा पा रहे थे कि उनकी मौत कैसे हुई? लोग बाते कर रहे थे कि किसी ने उन्हें जादू टोने से मारा है क्योंकि उन तीनो का शरीर पूरी तरह काला पड़ चुका था। मामा, दादी से बाते कर रहे थे कि जिस वक्त वह मम्मी-पापा और छोटे भाई का अंतिम संस्कार कर रहे थे उस वक्त पण्डित वेदव्यास जी वहाँ पर आए थे। उन्होने कहा था कि 'वह बंगला खाली कर के चले जाओ... नही तो वो सबको मार देगा " उन्होने बस इतना ही कहा और वह वहाँ से चले गये। दादी ने भी मामा से कहा "हाँ मुझे भी लगता है कि हमें यह बंगला बेच देना चाहिए पर मामा नहीं माने। मम्मी-पापा और छोटे भाई के अंतिम संस्कार को अभी बस दो ही दिन हुए थे। मैं अपने कमरे में सो रही थी तभी दादी की जोर-जोर से रोने की आवाज सुनाई देने लग गयी जिस कारण मेरी नींद खुल गयी। जिस कमरे से दादी के रोने की आवाज आ रही थी जब मैं वहाँ पर पहुँची तो देखा मामा जमीन पर मरे पड़े थे उनके गले से खून बह रहा था। ऐसा लग रहा था कि किसी ने तेज धार वाले चाकू से उनका गला काट दिया हो। वही पर दादी खड़ी थी जिनके हाथ में खून से लिपटा हुआ चाकू था। दादी रोये जा रही थी और रोते-रोते कहती "देख सौम्या.. यह तेरे मामा को क्या हो गया?" जब मैं रोते-रोते मामा की लाश के पास गयी तो देखा, दादी की आँख की काली पुतली गायब हो गयी थी। उनका बर्ताव और आवाज भी बदल गयी थी। उनके अंदर से किसी आदमी की आवाज आ रही थी। मुझे, दादी को देखकर डर लगने लगा था। उनकी आँखो मे मुझे मारने का जुनून नजर आ रहा था। मैं अपनी जान बचाकर वहाँ से भागने लग गयी और भागते-भागते सीढ़ियों से गिर गयी जिस कारण मेरे सिर से खून निकलने लग गया था। जो दादी, पहले लड़खड़ा-लडखड़ा कर चलती थीं वह मुझे मारने के लिए ऐसे भाग रही थी जैसे वह अभी भी जवान हो। मैं जल्दी से सीढ़ियों पर से उठी और दरवाजे की ओर भागने लगी। मैं दरवाजे तक पहुँची ही थी कि मेरा सिर दरवाजे से टकरा गया और दरवाजे का कुंदा मेरी आँंख पर लग गया। मैं वही पर गिर कर तड़पने लगी थी। मेरी आँख से खून बह रहा था। दादी मुझे मारने आ ही रही थी कि वह एक दम से रूक गयी जैसे वह किसी को देखकर डर गयी हो। जब मैंने पीछे मुड़कर देखा तो वहाँ मम्मी-पापा, छोटे भाई और मामा की आत्माएं थी, जो मेरे साथ थी। फिर मैंने जब दोबारा दादी की तरफ देखा तो उन्होने अपने हाथ का चाकू नीचे फैक दिया। जब मैंने वापस मम्मी-पापा की तरफ देखा तो वहां पर पोण्डित वेदव्यास थे। वह बार-बार मंत्र पढ़े जा रहे थे। पण्डित वेदव्यास जी दादी पर गंगा जल फेंकने ही वाले थे की दादी ने हँसते हुए अपने हाथ से अपना गला काट लिया। उनके हाथ चाकू की तरह पैने हो गये थे। उस वक्त उनका खून लाल नहीं काला था और वही खून मेरी आँखों पर आकर गिर गया था। जब सुबह आँखे खोली तो सब तबाह हो चुका था। मेरा पूरा परिवार खत्म हो चुका था। मेरी आँखो की रोशनी जा चुकी थी और यह बदसूरत निशान मेरे चेहरे पर आ गया था। इस निशान के साथ कुछ अदृश्य शक्तियाँ भी मुझे मिल गयी थी। पण्डित वेदव्यास जी ने मुझे बताया कि मेरी दादी पर किसी ने काला जादू किया था। मैंने उनसे पूछा "किसने किया था?' पर उन्होने कहा 'सही वक्त आने पर तुम्हे खुद पता चल जाएगा।" उस हादसे के बाद मुझे कुछ अजीब आवाजे सुनाईं देने लग गयी कोई मुझसे कहता रहता था "बचाओ-बचाओ मुझे तुम्हारी मदद की जरुरत है।" जब इस बारे में मैंने पण्डित वेदव्यास को बताया तो उन्होने कहा यह दूसरी दुनिया की आवाजें है काली दुनिया की जहाँ पर प्रेत आत्माओ का वास होता है, तुम्हें इन पर काबू करना सीखना होगा। उन्होने मुझे बंगाल के अराध्य विश्वविद्यालय में भेज दिया जहाँ पर मैंने तंत्र-मंत्र और अपनी शक्तियों का उपयोग करना सीखा। मैंने कई बार बोला पण्डित वेदव्यास जी से कि मैं वापस आना चाहती हूँ और अपने परिवार की मौत का पता लगाना चाहती हूं पर उन्होने कहा "जब सही वक्त आएगा मैं तुम्हे बुला लूगा।" तारीख 06 अगस्त 2017, रात 10:30 बजे "दबकन.... दबकन... यहाँ से बस वापस मुड़ने वाली है जिसे भी उतरना है जल्दी उतर जाओ।" बस कंडक्टर ने कहा। "हाँ भईया यही पर रोक दीजिए। हमें यही उतरना है।" विराट ने कहा विराट और सौम्या बस से उतर जाते है। "यह कहानी छुपी थी मेरे इस निशान के पीछे।" सौम्या ने कहा कुछ पल के लिए विराट निःशब्द हो जाता है। सौम्या और विराट सड़क पर चलते जा रहे थे। सड़क के दोनो तरफ दूर-दूर तक काची जंगल फैला हुआ था। "तुमने बताया नहीं एंजल के चले जाने के बाद क्या हुआ?" सौम्या ने कहा। "एंजल के चले जाने के बाद मेरी जिन्दगी फिर से अंधेरे में डूब गयी। बहुत कोशिश की भूला दू उसे पर नहीं भूला पाया, भला कोई अपनी जिन्दगी के हिस्से को भी भूला पाता है क्या? एंजल के जाने के बाद मेरे दिन और रात दोनों मैखाने में बीतने लग गये। एंजल के मिलने से पहले में दिन मे एक पैकेट सिगरेट पीता था पर उसके जाने के बाद मैं हर घण्टे में एक पैकेट खत्म करने लगा। उसे भूलाने के लिए मैंने नशे का साहारा लिया। सारे नशे करके देख लिए थे पर उसकी मोहब्बत के नशे के सामने सारे नशे फिके पड़ने लग गये थे। सही कहा है किसी ने लड़कियों में आबाद और बर्बाद दोनों करने की ताकत होती है। करण ने मुझे बहुत बार समझाया कि भूल जा उसे और ये नशे की लत छोड़ दे बर्बाद कर देगी यह लत तुझे।" डॉक्टर रुपम पराते ने तो चैतावनी थी दे दी थी कि 'अब अगर एक बूंद भी शराब की शरीर के अंदर गयी तो मौत निश्चित है फिर तुम्हें भगवान भी नहीं बचा पाएगें" पर मैं कहाँ मानने वाला था। मैं तो उसी वक्त मर गया था जब एंजल मुझे छोड़कर गयी थी। 2 महिने बीत गये थे एंजल को गये हुए। मुझे इस बात की नाराजगी नहीं थी कि एंजल मुझे छोड़कर चले गयी। नाराजगी तो इस बात की थी कि वह आखरी बार मुझसे मिलकर जाती, मेरे सामने मुझे ठुकराकर जाती। एंजल से मिलकर जो जीने की उम्मीद मुझे मिली थी वह उसके जाने के बाद फिर से मर गयी थी। लगा था सारी जिंदगी शराब पीकर ही गुजरेगी पर शायद किस्मत को कुछ और हि मंजूर था। तारीख 17 अप्रैल 2017, रात 02:00 बजे मैं मैखाने से वापस अपने घर जा रहा था। उस रात मैंने कुछ ज्यादा ही शराब पी हुई थी। मेरी कार 200 किमी प्रति घण्टे की रफ्तार पार कर चुकी थी कि तभी अचानक से मेरी कार के सामने एक लड़की आ जाती है और मेरी कार से उसका एक्सीडेंट हो जाता है| यह हादसा ठीक वैसा ही हादसा था जो इससे पहले एंजल के साथ हुआ था पर इस बार फर्क सिर्फ इतना था कि मैं कार से नीचे नहीं उतरा था। मैंने सोच लिया था मैं अब जिन्दगी मे किसी की मदद नहीं करुगां। मैंने कार वापस रिवर्स ली। मैं कार रिवर्स ले ही रहा था कि तभी कार के दाये आईने में मुझे वह लड़की दिखाई दी मुझे उसकी सुरत ठीक से नहीं दिख रही थी क्योंकि उसके चेहरे पर उसके बाल बिखरे हुए थे। मेरी कार सीधे उसके पैरों से टकराई थी जिस कारण उसके पैरो में से खून निकल रहा था। एक पल के लिए लगा, मुझे उसकी मदद करनी चाहिए पर जब जहन में एजल का ख्याल आया, तो लगा यहाँ चले से जाना ही ठीक होगा। मैं फिर से कार रिवर्स लेने लग गया। मैं कार रिवर्स ले ही रहा था कि तभी हवाए तेज चलने लग गयी और उस लड़की के बाल हवा में उड़ने लग गये। जब मैंने दोबारा कार के आईने में देखा और जो मैंने देखा वह मैं आपको बता नहीं सकता। वह लड़की कोई और नहीं मेरी एंजल थी। मैं झट से कार से नीचे उतरा और एंजल को उठाकर कार में बैठाया। मेरी आँखो से आँसू बहते जा रहे थे। मेरे समझ़ नहीं आ रहा था कि यह भगवान की कैसी नियती है। एंजल को मिलाया भी तो इस हालत में, इससे अच्छा होता कि वह मुझसे एंजल को कभी नहीं मिलाते। जब मैंने कार चालू की तो वह चालू नहीं हो रही थी पता नहीं क्या हो गया था? मैंने करण को फोन करना चाहा पर वहाँ पर नेटवर्क नहीं मिल रहा था। शायद मेरी किस्मत ही खराब थी वह कहते है ना जब इंसान का वक्त खराब चल रहा होता है तो उसकी किस्मत भी उसका साथ नहीं देती है।" मैंने बहुत कोशिश की कार चालू करने की पर कार चालू नहीं हुई फिर मुझे याद आया जब मैंने एंजल को देखा था तो वह जंगल की तरफ से भागते हुए आ रही थी, हो न हो मुझे जगंल में जरुर किसी की मदद मिल जाएगी। मैंने एंजल को उठाया और जंगल की तरफ ले गया। करीब आधे घंटे चलने के बाद मुझे पीले रंग की रोशनी दिखी। पूरे जंगल मे सिर्फ एक वही जगह थी जहाँ पर रोशनी नजर आ रही थी। मुझे पूरा यकीन था कि वहाँ पर कोई मेरी मदद करने वाला जरुर मिल जाएगा। जब मैं और आगे बढ़ा तो वहाँ पर एक सफेद रंग का बंगला था। जब मैं उस बंगले के दरवाजे के पास पहुँचा तो देखा उस बंगले का दरवाजा पहले से खुला हुआ था। मैंने आवाज लगाई कोई है....कोई है..."पर कोई जवाब नहीं आया। रात का वक्त था इस वजह से वहाँ पर जगंली-जानवरो के चिल्लाने की आवाजे सुनाई दे रही थी। उस वक्त मुझे एंजल को बंगले के अंदर ले जाना ही ठीक लगा। मैं बंगले के अंदर चला गया और फिर आवाज दी। "कोई है...? कोई है....पर फिर कोई जवाब नहीं आया। मैंने एंजल को उस बंगले के सीढ़ियों के ऊपर वाले कमरे में सूला दिया था और उसके कुछ जख्मों कि मरहम पट्टी भी कर दी थी। उसका पीले रंग का सूट खून से लतपट था। इस बार एंजल के शरीर पर पहले से ज्यादा घाव थे। इससे पहले जब वह मुझे मिली थी तो उसके सिर्फ हाथ पैरों पर जख्मों के निशान थे पर इस बार हाथ-परों पर खरोंच के निशान तो थे ही पर चेहरे पर भी खरोच के निशान थे। कुछ समझ़ नहीं आ रहा था एंजल को यह खरोंच के निशान कैसे लगे होगे? वह हर बार मुझे काची जंगल के पास ही क्यों मिलती है और वह 2 महिने तक कहाँ गायब हो गयी थी। मेरे जहन में बहुत सारे सवाल थे पर सारे सवालो के जवाब एंजल के पास थे ।