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Chapter 2 :

भाग 2

'जब मेरा जन्म हुआ उसी वक्त मेरी माँ की मृत्यु हो गयी। मुझे मेरे बचपन के बारे में ज्यादा कुछ तो याद नहीं पर जब भी बचपन के बारे में याद करता हूँ तो बस एक बच्चा और एक बच्ची याद आते है जिनकी उम्र लगभग 6 साल होगी। उस बच्ची के लम्बे-लम्बे बाल थे और वह नीले रंग की फ्रॉक पहनी हुई थी। वह दोनों एक नदी के पास थे। वही पर एक बड़ा सा बरगद का पेड़ भी था, जिससे रस्सी का एक झूला बंधा हुआ था। उसी झूले पर वह बच्ची झूला-झूल रही थी और वह बच्चा उसे झूला-झुला रहा था। उस बच्ची की हँसी बार-बार मेरे कानो मे गूंजती है। वह बच्ची उस बच्चे से कहती है और तेज राज.....और तेज झुला दो।" "निमू....इससे तेज नही दे सकता।" उस बच्चे ने कहा। बचपन के बारे मे जब भी कुछ याद करो तो बस यही सब याद आता है और हर बार यही सपना मुझे परेशान करता है। मुझे तो यह भी नहीं पता सपने में जों बच्चा मुझे दिखता है वह मैं हूं या कोई और? मुझे तो कभी उन दोनों बच्चों का चेहरा भी नहीं दिखा। हर बार मैं उन्हे सपने में पीछे से देखता हूँ। मैं जब 12 साल का था तब पापा ने मुझे हॉस्टल में भेज दिया। वहाँ पर वह महिने में एक बार मुझसे मिलने आ जाया करते थे, शायद यह याद दिलाने कि वह जिन्दा है और मेरे इस दुनिया में एक पिता भी है। माँ के बचपन, मे ही गुजर जाने और पापा का अपने कामो में व्यस्त हो जाने के कारण प्यार क्या होता है यह मुझे नहीं पता। हां नफरत किस कहते हैं यह जरुर पता चल गया था, इससे गहरा रिश्ता हो गया था मेरा। हॉस्टल में एक दोस्त मिला था मुझे, जिसने मेरे दिल में थोड़ी सी मोहब्बत जगा रखी थी करण... करण भिडे नाम था उस दोस्त का... दोस्त कहना गलत होगा असल मे वह भाई था मेरा। करण एक अनाथ था। जब कभी मैं अपने पापा पर गुस्सा करता या भगवान को कोसता था, तो वह हमेशा कहता था कि "तुम्हे तो भगवान का शुक्रगुजार होना चाहिए कि तुम्हे अपने माता-पिता को देखा तो है, मुझे तो मेरे माता-पिता का नाम भी नहीं पता।" करण हमेशा मेरा ख्याल रखता था। हॉस्टल मे मेरे लिए खाना लेने की लाईन में वही लगता था और मेरी सारी शरारतों के इल्जाम अपने ऊपर ले लेता था। जब मुझे बुखार होता था तो पापा फोन करने पर भी नहीं आते थे पर, करण रात भर जाग कर मेरा ख्याल रखता था। हाँ, पापा पैसे समय-समय पर भजे देते थे, भेजते भी कैसे नहीं हमारा हीरो का व्यापार जो था। जो धीरे-धीरे काफी बड़ गया था, पापा ने विदेशो में भी व्यापार करना शुरू कर दिया था। अभी मैं 18 साल का हुआ ही था कि पापा की एक सड़क हादसे में मौत हो गयी है। पापा के गुजर जाने के बाद करण ने ही मुझे संभाला था। पापा का व्यापार काफी बड़ा था इसलिए करण मेरी मदद करने लगा। वह मेरी कम्पनी का मैनेजर बन गया था। सच तो यह था कि मैं तो बस नाम मात्र का मालिक था, पूरी कम्पनी का जिम्मा तो करण ने अपने सिर पर उठाकर रखा था पर कुछ काम में भी कर लेता था, जैसे कागजो पर दस्तखत करना। पापा का बिजनेस संभालने के साथ-साथ मैंने उनकी कुछ बुरी आदते भी अपना ली थी जैसे शराब पीना, सिगरेट पीना, देर रात तक घर आना और भी बहुत कुछ...पर हाँ कभी किसी लड़की को गलत नजर से नहीं देखा, न छेड़ा, भले ही कितने भी नशे में रहू पर नारी को हमेशा देवी की तरह पूजा। करण ने मुझे कई बार टोका कि सिगरेट और शराब पीना बंद कर दे। इसी बात पर कई बार हमारे बीच झगड़े भी हुए पर मैं कहा किसी की सुनने वाला था। शराब और सिगरेट की लत धीरे-धीरे और बड़ने लगी थी। मैं करता भी तो क्या करता? मेरी जिन्दगी में तन्हाईया बहुत थी और उन्हीं तन्हाईयों को मिटाने की जिम्मेदारी, शराब और सिगरेट ने लेकर रखी थी। जिन्दगी में सिर्फ दर्द ही दर्द भरा हुआ था। देर रात तक ऑफिस में काम करना और घर लौटते वक्त शराब पीना यह आदत बन गयी थी मेरी। मुझे तन्हाईया पसंद आने लगी थी। इन तन्हाईयों से अब अपनापन सा लगता था। तन्हायों में ही रहने के लिए मैंने दबकन शहर से 10 किलोमीटर दूर, 30 किलोमीटर तक फैले काची जंगल के खत्म होने के बाद, मनीपूर में एक बंगला बनवाया था। वही पर मैं अपनी तन्हायों के साथ रहता था तारीख 10 फरवरी 2016, रात 02 बजे हर दिन की तरह उस दिन भी मैं देर रात ऑफिस का काम खत्म कर शराब पीकर, अपनी लाल रंग की फरारी से घर जा रहा था। मेरे एक हाथ में फ़रारी की स्टेरिंग थी, तो दूसरे हाथ में रॉयल स्टेज शराब की बोटल। अरिजीत सिंह मेरा फेवरेट सिंगर था, इसलिए हमेशा की तरह उसके ही गाने मेरी फरारी मे बज रहे थे। साथ में मैं भी गुनगुना रहा था। "तुम साथ हो या न हो....क्या फर्क है... बेदर्द थी, जिंदगी बेदर्द है....." उस दिन मैंने कुछ ज्यादा ही शराब पी रखी थी, मैं गाने की आवाज बढ़ाने के लिए नीचे झुका और जब आवाज बढ़ाकर ऊपर देखा तो अचानक कार के सामने एक लड़की आ गयी। नशे की हालत मे मुझे पता हि नहीं चला कि कब वह लड़की मेरी कार के सामने आ गयी। मैंने होश संभालते हुए ब्रैक लगाये पर तब तक काफी देर हो गयी थी। वह लड़की मेरी कार से टकरा चुकी थी। मैं उसी वक़्त कार से बाहर निकला और उस लड़की के पास गया। वह लड़की कार से टकरा कर कार के पास ही गिर गयी थी, उसके सिर से खून निकल रहा था। मैंने अपने चारो तरफ देखा और सोचा इससे पहले की मुझे कोई देखे, मुझे यहाँ से निकल जाना चाहिए, वरना मैं मुसिबत में पड़ सकता हू। मैं वापस जाकर अपनी कार मे बैठ गया। मैं कार चालू कर ही रहा था कि तभी मुझे "हेल्प मी...हेल्प मी.... "एक लड़की की आवाज सुनाई दी। वह आवाज उस लड़की के पास से आ रही थी। वह लड़की धीरे-धीरे अपने हाथ की उंगलिया हिलाने लग गयी। पता नहीं क्यो? पर मुझे लगा मुझे उस लड़की की मदद करनी चाहिए। मैंने उस लड़की को उठाया और कार मे बैठा दिया। मैंने सोचा, ऐसी हालत में अभी उसे अपने घर ही ले जाना ठीक होगा, अगर हॉस्पिटल ले गया तो पुलिस केस हो सकता है और मैंने शराब भी पीकर रखी है पुलिस वाले कभी मेरी बात पर यकिन नहीं करेगे। मैं उस बेगानी लड़की को लेकर अपने घर चला गया। जब मैं उसे अपनी कार से उतार रहा था तो उस वक्त भी उसकी घनी जुल्फों ने उसका चेहरा ढक कर रखा था। मैं उसका चेहरा अभी तक नहीं देख पाया था। मेरे मन मे उसका चेहरा देखने की इच्छा बढ़ती जा रही थी। जब मैं उसे अपने कमरे में ले गया और अपने बैड पर लेटा दिया उस वक्त भी उसकी जल्फों ने उसके चेहरे को ढक कर रखा था। उसकी काली-काली जुल्फो में से मुझे बस उसकी दो आँखे नजर आ रही थी पर अब मेरा ध्यान उसके चेहरे से हटकर उसके शरीर के घावो पर चला गया था। उसके सिर पर जो घाव था, वह तो मेरी कार से टकराने के कारण आया था पर बाकी के घाव कैसे आए थे? उसके हाथ-पैरों में खरोच के निशान थे, जो पूराने लग रहे थे। मेरे समझ नहीं आ रहा था कि इतने गहरे घाव इस लड़की को कैसे लगे होग? इसी ने खुद को दिए या किसी और ने.... मेरे जहन में बहुत सारे सवाल थे पर सारे सवालो के जवाब जिसके पास थे वह अभी होश मे नहीं थी। मैं इंतजार कर रहा था उसके होश में आने का। मैंने डॉक्टर रूपम पराते को फोन कर दिया था, जोंकि मेरे फेमिली डॉक्टर थे। मैंने बस उनसे इतना कहा था कि "आप जल्द से जल्द मेरे घर आ जाइये... बाकि सब मैं आपको मिलकर बताऊगा। डॉक्टर साहब की उम्र 44 साल थी पर उनका दिल अभी भी जवान था। किसी ने कहा था ना 'इमारत भले ही पुरानी हो गयी हो, पर नीव अभी भी। मजबूत है" वह शायद इनके लिए ही कहा गया है। डॉक्टर साहब का वजन करीब 70 किलो होगा। जब वह अपना मुँह फाड़कर हँसते थे तो उनकी तोंद हिलने लग जाती थी उनकी हँसी इतनी फेमस थी कि उसकी आवाज सुनकर हर कोई समझ जाए कि यह हंसी तो डॉक्टर साहब की है। डॉक्टर साहब ने शादी अभी तक नहीं की थी कहते थे "शादी एक कैद की तरह होती है और यदि शादी के बाद बच्चा हो जाए तो वह कैद उम्र कैद में तबदील हो जाती है।" मैं अपने कमरे में उस लड़की के पास बैठा ही हुआ था कि तभी बैड के पास लगी खिड़की में से जोर से एक हवा का झोका अंदर आया। जिस कारण, बैड पर लेटी उस लड़की के चेहरे पर के बाल हवा में उड़ने लगे। जब मैंने उस लड़की का चेहरा देखा, तो मैं बस उसे देखते ही रह गया। उसके चेहरे में न जाने क्या जादू था जो मुझे उसकी तरफ खीच रहा था। उसके चेहरे को देखकर एक अपनापन सा लग रहा था मुझे, लग रहा था कि कोई गहरा रिश्ता है मेरा उसके साथ। मैं उसका चेहरा देखकर सब कुछ भूल गया था। उसकी दो झील से गहरी आँखे, उसके रस से भरे होंठ, उसकी सुनहरी जुल्फें किसी अपसरा से कम नही लग रहा था उसका चेहरा उस हालत में भी। तारीख 10 फरवरी 2016 सुबह 5 बजे तभी किसी ने दरवाजे पर दस्तक दी। जब मैंने दरवाजा खोला तो देखा डॉक्टर साहब आए थे। मैंने डॉक्टर साहब को कुछ नहीं बताया, बस इतना कहा "जिसका आपको इलाज करना है वह ऊपर है।" डॉक्टर साहब मेरे परिवार के सदस्य की तरह थे इस वजह सें उन्होने मुझसे उस वक़्त कुछ नहीं पूछा। डॉक्टर साहब ने उस लड़की की मरहम पट्टी कर दी थी। डॉक्टर साहब ने कुछ दवाईयां मंगवाई थी, मैं उसी वक्त वह ले आया था। वैसे इतनी सुबह दवाईयो की दुकान नहीं खुलती पर डॉक्टर साहब की एक परिचित की दुकान थी उन्होंने उनसे फोन पर बात कर ली थी। जब मैं कार से दवाइयां लेने जा रहा था उस वक्त मेरे मन में बस यही ख्याल आ रहा था कि भगवान उस लड़की को कुछ नहीं होना चाहिए पता नहीं यह ख्याल मेरे मन में बार-बार क्यो आ रहा थाी? बस मैं उस लड़की को खोना नहीं चाहता था पर....पर मैंने उसे पाया ही कब था... जो उसे खोने से डर रहा था.... मुझे तो उसका नाम तक नही पता था!.... शायद इसी को पहली नजर का प्यार कहते है। जिसे भले ही आपने पाया नहीं हो, पर उसे खोने का डर आपको, पहले सताने लगता है। तारीख 20 फरवरी 2016, सुबह 11 बजे मैं और डॉक्टर साहब हॉल में सोफे पर बैठकर चाय पी रहे थे। चाय मुझे ही बनानी पड़ी क्योंकि मैंने घर में बस एक ही नौकर रखा था और वह भी इस वक्त छुट्टी पर अपने गाँव गया था। इसी कारण मुझे रोज होटल से खाना मंगवाना पड़ता था। चाहता तो नया नौकर रख लेता पर क्या करता, नये लोग से ज्यादा मुझे तन्हाईयाँ ज्यादा पंसद थी और जल्दी किसी पर भरोसा भी नहीं होता था। "यह लड़की कौन है?" डॉक्टर साहब ने मुझसे पूछा । मैं इस सवाल का जवाब देता इससे पहले हि जिस कमरे में वह लड़की थी, वहां से उसके चिल्लाने की आवाज सुनाई दी। डॉक्टर साहब और मैं भागते-भागते उस कमरे मे गये। वहाँ पर जाकर देखा उस लड़की को होश आ गया था। डॉक्टर साहब ने उसे ग्लूकोज की बोटल भी चड़ाई थी। जिससे धीरे-दीरे ग्लूकोज सिरिंज में से होकर उस लड़की के शरीर में जा रहा था। उस बोटल में से ग्लूकोज लगभग खत्म होने वाला था। शायद यह उस ग्लूकोज का हि कमाल था कि जैसे ही डॉक्टर साहब ने उसके हाथ मे से ग्लूकोज की सुई निकाली, वह मुझ पर जोर से चिल्लाकर कहने लगी "कौन हो तुम.... और मेरे पर में क्या कर रहे हो?" एक पल के लिए तो मेरे समझ नहीं आया की वह लड़की कहना क्या चाहती है? मुझे तो लगा सिर पर गहरी चोट लगने के कारण वह पागल हो गई है। वह लड़की मुझसे बार-बार यही कहे जा रही थी। "बाहर निकलो मेरे घर से......बाहर निकालो" उस लड़की को मुझे देखकर इतना ज्यादा गुस्सा आ रहा था, ऐसा लग रहा था कि वह मुझे कच्चा चबा जाएगी। डॉक्टर साहब ने मेरी तरफ देखते हुए कहा "विराट मुझे लगता है कि इस वक्त तुम्हारा इस कमरे से बाहर चले जाना ही ठीक होगा।" मैं उस कमरे से बाहर चले गया। डॉक्टर साहब 30 मिनट से उस लड़की के कमरे मे थे। मेरा मन बैचेन हो रहा था यह सोचकर की डॉक्टर साहब उस लड़की को क्या समझा रहे होगे, उन्हे तो उस लड़की के बारे में कुछ भी पता नहीं है। तभी डॉक्टर साहब कमरे से बाहर आ गये। "मैंने अभी उसे नींद का इंजेक्शन दे दिया है। सिर पर गहरी चोट लगने के कारण वह अपनी याददाश्त खो चुकी है। और उसे लगता है कि यह घर उसका है।" डॉक्टर साहब ने कहा। 'क्या उसे कुछ भी याद नहीं है?" "नहीं उसे कुछ याद नहीं है।" "क्या हम उसे उसका अतीत याद दिलाने की कोशिश नहीं कर सकते?" नहीं बिल्कुल... नही... यदि हमने ऐसा किया तो हो सकता है कि वह कोमा में चले जाए और फिर वह कभी कोमा से बाहर न आ पाए।" ठीक है डॉक्टर साहब, पर अब आगे क्या करना है?" "उसकी हालत देखते हुए मुझे लगता है कि वह लड़की जैसा समझ रही है, उसे वैसा समझने देना चाहिए। बहुत से केसेस में कई मरिजो को यही लगता है फिर धीरे-धीरे वक्त के साथ उनकी याददाश्त खुद वापस आने लगती। "पर तब तक क्या करू मैं?" 'यह मुझे नहीं पता.... देखो मैं एक डॉक्टर हूं और मेरा काम है मरीज को होश में लाना वह मैंने कर दिया है। अब तुम देखो... तुम्हे आगे क्या करना है? मुझे तो मेरे मरिजों को देखने जाना है।' डॉक्टर साहब ने अपनी घड़ी में देखते हुए कहा 'वैसे भी 11: 45 बज गये हैं...मैं पहले ही अस्पताल के लिए लेट हो चुका हूँ। इतना कहकर डॉक्टर साहब अपने अस्पताल जाने के लिए रवाना हुए। वह दरवाजे तक पहुँचे ही थे कि उन्होने पलट कर पूछा 'वैसे यह लड़की है कौन? आज से पहले तो इसे कभी नहीं देखा? फिर मैंने उन्हें सारा किस्सा सूनाया कि कल रात मेरी कार से इसका एक्सीडेंट हो गया था और उस वक्त मैंने उसे अपने घर लाना ही ठीक समझा इसलिए मैं उसे अपने घर पर ले आया।"कुछ देर के लिए डॉक्टर साहब चुप हो गये । "आज से पहले तो मैंने तुम्हे किसी की मदद करते हुए नहीं देखा और आज की तो वह भी इतनी बड़ी ।" डॉक्टर साहब का कहना ठीक था। इस दुनिया के साथ-साथ मैं भी खुदगर्ज बन गया था। न किसी के दुःख दिखते थे न दर्द, मैं बहुत मतलबी बन गया था। "वैसे यदि तुम्हे इसे अपने घर में रखने में कोई परेशानी हो तो मैं इसे अपने अस्पताल ले जाता हूँ? वहाँ पर इसकी अच्छे से देखभाल भी हो जाएगी।" "नहीं......नही....डॉक्टर साहब वहां पर पुलिस आ सकती है और फिर वह तरह तरह के सवाल पूछेगी, मैं मुसिबत में पड़ सकता हूँ। वैसे भी पुलिस वालों का काम होता है बाल की खाल उतारना। सच को झूठ और झूठ को सच बनाना।" "ठीक है, जैसा तुम ठीक समझो, यदि मेरी कोई जरूरत हो तो जरूर बताना।" इतना कहकर डॉक्टर साहब वहां से चले गये। डॉक्टर साहब को गये हुए 1 घण्टा बीत चुका था और मुझे मेरे ही घर से वनवास मिल चुका था। कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अपने घर में कैसे घुसू? मैं अपने घर के सामने बगीचे में लगी एक बेंच पर बैठा हुआ था। तभी मेरे दिमाग मे एक आइडिया आया। वह लड़की होश में आ चुकी थी और उसको बहुत भूख लग रही थी। वह लड़की खाना खाने के लिए किचिन में जा ही रही थी कि तभी किसी ने दरवाजे की बेल बजाई। जब उसने दरवाजा खोला तो देखा, दरवाजे पर विराट था। "तुम.....!"उस लड़की ने कहा। "हाँ मैं... "विराट ने कहा। "चले जाओ यहाँ से, तुम्हें एक बार में समझ में नहीं आता क्या? मना किया था ना यहाँ मत आना।" "हाँ जानता हूँ पर एक बार मेरी बात तो सुन लीजिए। 'नहीं मुझे कुछ नहीं सुनना।" उस लड़की ने गुस्से में कहा। "प्लीज एक बार।" "मैंने कहा न.. मुझे कुछ नहीं सूनना।" "देखिए मैं बहुत मुसिबत में हूँ, मुझे नौकरी की सख्त जरूरत है।" "पर मुझे नौकर की कोई जरूरत नहीं है।" इतना कहकर उस लड़की ने जोर से दरवाजा विराट के मुँह पर बंद कर दिया। ऐसा लग रहा था कि उस लड़की ने विराट के मुँह पर एक जोर से तमाचा मारा हो। वैसे विराट बहुत गुस्से वाला इंसान था। चाहता था तो उसी वक्त वह उस लड़की को अपने घर से निकाल देता पर उसने ऐसा नहीं किया। शायद इसलिए क्योंकि विराट उस लड़की को पहली नजर से ही पंसद करने लगा था और इसे ही तो प्यार की शुरुआत कहते हैं जो झगड़े से शुरु होती है और मोहब्बत पर खत्म होती है। कुछ देर बाद उस लड़की की भूख और बढ़ने लग गयी। वह किचन में गई और खाने का सामान ढूंढ़ने लग गयी। उसके पेट में चूहे कुदने लगे थे। किचन में फल फ्रूट नहीं रखे थे। वहाँ पर कुछ भी ऐसा नहीं था जिसे वह खा सके। हाँ, वहाँ पर सब्जियाँ जरूर रखी थी पर वह क्या करती? खाना तो उसे बनाना ही नहीं आता था। वह अपने कमरे में गयी और खिड़की से झाककर देखा की विराट अभी भी उसके गार्डन मे बेंच पर बैठा हुआ था। उस लड़की के सिर में दर्द होने लगा और वह सो गयी। तारीख 10 फरवरी 2016,शाम 5 बजे अब चूहें उस लड़की के पेट मे तांडव करने लग गये थे जिस कारण उस लड़की की नींद खुल जाती है। वह खुद से कहने लगी "यदि अब मेरे पेट में कुछ नहीं गया, तो मैं मर जाऊगी...काश मैंने उस लड़के की बात सुन ली होती और उसे नौकरी पर रख लिया होता, तो कम से कम मुझे भूखे पेट तो नहीं मरना पडता ।" वह अपने बैड से उतरकर, उदास चेहरा लेकर खिड़की के पास जाती है। जब उसने खिड़की से बाहर झाककर देखा, तो उसके चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। विराट अभी भी गार्डन में बेंच पर बैठा हुआ था। वह भागते-भागते सीढ़ियों से नीचे जाती है और गेट खोलकर विराट को देखने लगती है। विराट जमीन से अपनी नजर उपर उठाते हुए उसे देखता है। वह लड़की विराट को अपने हाथ से इशारा करके अपने पास बुलाती है पर विराट को उसका इशारा समझ में नहीं आता और वह वही पर बैठा रहता है फिर उस लड़की ने जोर से विराट को आवाज देते हुए कहा। "ऐ लड़के इधर आओ।" विराट भागते हुए उस लड़की के पास जाता है ऐसा लग रहा था कि विराट इसी पल का इंतजार रहा था कि कब वह लड़की उसे पुकारे। "तुम्हें नौकरी चाहिए थी ना.."उस लड़की ने कहा। "हाँ मैम" "वैसे क्या--क्या काम कर लेते हो तुम?" "मैम मैं सब काम कर लेता हूँ। खाना बनना, कपड़े धोना, कार चलाना सब कुछ। सब काम आता है मुझे, आप बस काम बोलिये क्या काम करना है मुझे?" "वैसे तो तुम्हें ये सारे काम करने होगे पर तुम्हे मेरे मनोरंजन के लिए भी कुछ करना होगा, क्या तुम्हे कुछ करना आता है जैसे गाने गाना, डांस करना या फिर स्टैंडअप कॉमेडी करना, ऐसा कुछ? विराट सिर पर हाथ रखकर सोचने लगा फिर एकदम से बच्चो की तरह हाथ उठाते हुए जैसे किसी शिक्षक ने कोई, सवाल पूछा हो और कहता है "हाँ...हाँ.. कर सकता हू ना, मैं आप के लिए शायरियां बोल सकता हूँ "अच्छा तो तुम शायर हो?" 'शायर तो नहीं पर हां.... कभी-कभी तंहाईयो को मिटाने के लिए लफ्जों का सहारा ले लिया करता हूँ और उन्हें पन्नों पर उकेर देता हूँ।" "हाँ ठीक है पर, तुम्हारी सैलेरी सिर्फ दस हजार होगी।" "ठीक है मैम' इतना कह कर विराट घर में घूसने लगा लेकिन तभी उस लड़की ने अपना हाथ दरवाजे पर रखते हुए उसका रास्ता रोक लिया। "अरे रूको.. रूको....अंदर कहां जाते हो.. जाने से पहले कुछ अर्ज तो कर दो ।" "न चाद माँगूगा, न सितारे माँगूगा रहे मुस्कान सदा तेरे चेहरे पर, यही दुआ माँगूगा "वाह वाह वाह हमे साथ रहते-रहते एक साल हो गया था पर अभी तक मैंने एंजल को अपने दिल की बात नहीं बताई थी। अभी तक हम दोनों सिर्फ बेस्टफ्रेंड थे। कई बार सोचा कि अपनी मोहब्बत का इजहार कर दू पर एक डर सताता है ना सबको की वो क्या सोचेगी मेरे बारे में, यदि उसने मना कर दिया तो और यदि दोस्ती भी तोड़ दी तो, यही डर मुझे भी सताए जा रहा था। दुनिया मे सारी चीजे सही है पर बस एक गलत है कि हर जगह यह नियम लागू होता है कि लेडीस फर्स्ट पर पता नहीं मोहब्बत में यह नियम लागू क्यो नहीं होता? हर बार लड़को को ही अपनी मोहब्बत का इजहार पहले क्यो करना पड़ता है? इसका जवाब तो शायद भगवान के पास भी नहीं होगा बहुत इंतजार कर लिया था मैंने पर अब नहीं हो रहा था। मैंने सोच लिया था कि अब मैं एंजल से अपने दिल की बात कह दूंगा फिर चाहे जवाब कुछ भी हो। यदि उसने हाँ बोला तो उसके साथ शादी कर लुंगा और यदि ना बोला तो अपनी सारी जायदाद उसके नाम करके उसकी जिन्दगी से हमेशा के लिए दूर चला जाऊंगा। तारीख 14 फरवरी 2017, शाम 6 बजे मैंने एंजल को मिलने के लिए बुलाया था। मैंने पूरा रेस्टोरेंट उसके लिए बुक कर लिया था। मैं चाहता था, जब मैं एंजल से अपने प्यार का इजहार करू तो वहा पर सिर्फ वो और मैं रहे, वह मुझमें खो जाए और मैं उसमें खो जाऊ। वहाँ पर काम करने वालो को मैंने पहले ही सब समझा दिया था कि वह जैसे ही गैट से आए उसके ऊपर फूलो की बरसात होनी चाहिए। जब वह चलते-चलते मेरे पास आए तब संगीत बजना चाहिए। सारी तैयारी हो गयी थी रेस्टोरेंट को अंदर और बाहर से सफेद और लाल रंग के दिल के आकार के गुबारो से सजाया गया था। मैंने नीले रंग की शर्ट और काले रंग की पेंट पहन कर रखी थी। मैंने सोच लिया था जब एंजल आएगी तो उससे यही कहुंगा "तुम मुझे अपना पनाहगार बना लो, मुझे भी इश्क का गुनहगार बना लो, ठुकरा चुका है जमाना मुझे कबसे, मुझे अपनी जिंदगी का किरदार बना लो" अब इंतजार था तो सिर्फ एंजल के आने का, मैंने एंजल को 6 बजे बुलाया था पर 7 बज गये थे वह अभी तक नहीं आई थी। 7 से 8, 8 से 9, 9 से 10, 10 से 11 बज गये उसका इंतजार करते-करते पर वह नहीं आई। रेस्टोरेंट बंद करने का समय हो गया पर मैं नहीं चाहता था रेस्टोरेंट बंद हो। यदि एंजल आ गयी और उसे रेस्टोरेंट बंद मिला तो वह मुझसे क्या कहेगी कि 'तुम मेरा थोड़ी देर भी इंतजार नहीं कर पाए।" यही सोचकर मैंने रात ही रात में वह रेस्टोरेंट खरीद लिया। एक तरफ दिमाग कह रहा था की वह नहीं आएगी अगर उसे आना ही होता तो वह अब तक आ जाती और शायद उसे पता है कि मैंने आज 14 फरवरी को उसे क्यो बुलाया है?" मैं समझ गया था कि वह मुझसे प्यार नहीं करती पर दिल कह रहा था कि वह आएगी। वह मुझे ठुकराने ही आए पर आए जरूर। मैं उसे बस आखरी बार देखना चाहता था। 'तरस गई आँखे मेरी तेरे दीदार को कुछ तो रहम कर इस दिल-ए-लाचार को" कितना इंतजार करु मैं अब तू ही बता या तू ही जहर दे दे इस "इश्क-ए-गवार को सारी रुसवाईयां सह ली मैंने तेरे लिए अब तू लांघकर आजा इस "नफरत-ए-दिवार को" मोहब्बत न सही नफरत ही दे दे कुछ तो सजा दे इस मोहब्बत-ऐ-गुनाहगार को" तारीख 15 फरवरी 2017, सुबह 8 बजे रात भर उसकी याद में अश्क बहाते-बहाते कब आँख लग गयी पता ही नहीं चला। जब सुबह हुई तो देखा। रेस्टोरेंट के नौकर वहाँ पर सफाई कर रहे है। मुझे लगा अब मुझे एंजल को फोन करके आखिरी बार अलविदा कह देना चाहिए। मैंने उसे फोन किया पर उसका फोन नहीं लग रहा था। मुझे उसकी फिक्र होने लगी। मैं उसी वक्त घर गया जब घर गया तो देखा घर का दरवाजा पहले से खुला हुआ था। मैंने एंजल को आवाज दी पर कोई जवाब नहीं आया। मैंने उसे घर के हर कोने में ढूंढा पर वह कही नहीं मिली। मैंने करण को फोन करके बुलाया और उसे सारी बात बताई। करण ने भी बहुत कोशिश की एंजल को ढूंढने की पर एंजल का कुछ पता नहीं चला। एंजल ऐसे गायब हो गयी थी कि जैसे पहले उसका कोई वजूद ही नहीं था। मुझे तो लगता था कि पिछले एक साल से मैं एक ख्वाब देख रहा था जो अब टूट गया था। एंजल के जाने के बाद मेरी जिन्दगी की शाम फिर से जामो में खोने लगी। जब एंजल मेरी जिन्दगी में नहीं आईं थी तब मैं सिर्फ रात मे शराब पीता था पर उसके जाने के बाद मैं दिन रात शराब पीने लगा था ।