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Prachi Sharma

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Chapter 2 :

दोस्ती की खातिर...

आज सुबह से ही बारिश हो रही थी। मंजू ने खिड़की से बाहर देखा तो ऐसा लग रहा था जैसे उसके और सामने वाले घर के बीच बारिश की एक झीनी चादर टंगी हो। पर स्कूल तो जाना ही था। आज फीस भरने की आखिरी तारीख़ थी। वर्ना परीक्षा में बैठने नहीं देंगे। मंजू स्कूल जाने की तैयारी में जुट गयी। पर उससे पहले उसे पापा से बात करनी थी। 'पापा...स्कूल की फीस भरनी थी। आज आखिरी...' 'ओह, हाँ मैं भूल गया था।' पापा ने कहा और फिर अपनी शर्ट की जेब से पैसे निकाल कर मंजू को पकड़ा दिया। 'संभाल कर ले जाना, ठीक है?' पापा ने हिदायत दी। 'जी पापा।' मंजू जानती कि ये पैसे अहम थे। बड़ा परिवार था तो अक्सर पैसों की तंगी रहती थी। बारिश अब रुक गयी थी। मंजू बारिश रुकते ही स्कूल के लिए निकल पड़ी। बारिश की वजह से सड़क खाली-खाली थी। पहली बारिश की बाद की बात ही कुछ और थी।मिट्टी की भीनी भीनी खुशबू मंजू का मन मोह लेती थी। स्कूल मैदान में खड़े होके काफी देर तक वह उसका लुत्फ़ उठाती रही। कोने मे खड़ा पेड़ ऐसा लग रहा था जैसे नहा धो कर खड़ा हो। आसमान भी इतना साफ़ लग रहा था। हर जगह नवीनता की खुशबू थी। प्रकृति ने जैसे दिवाली की सफाई की हो। मंजू वही खड़ी रहेगी क्या ? सुनीता की आवाज़ ने उसका ध्यान भंग किया 'फीस नहीं भरनी क्या ?' 'अरे भरनी है , चल चलते हैं।' दोनों भाग के परीक्षा शुल्क जमा करने के लिए कतार में खड़ी हो गई। मंजू ने पैसे को कसकर पकड़ रखा था। अचानक मैडम की आवाज़ ने उसका ध्यान अपनी तरफ़ खींचा। 'ऋत्विका, तुम्हारी परीक्षा की फीस कहाँ है?' 'मैडम, मैं लेकर नहीं आयी।' 'आपका क्या मतलब है?' 'मेरे पास पैसे नहीं हैं, मैम। मेरे पिताजी की नौकरी चली गई और हमारे पास आय का कोई अन्य स्रोत नहीं है।' 'ऋत्विका मैं समझती हूं, लेकिन हम हर छात्र की फीस इस तरह नहीं छोड़ सकते, नहीं तो स्कूल नहीं चल सकता।' 'मैडम एक बार इस पर विचार करें।' 'ऋत्विका, अगर आपको याद हो तो पिछली बार हमने इस पर विचार किया था, लेकिन हर बार नहीं कर सकते। यह नियमों के खिलाफ है। अगर आपने फीस नहीं भरी, तो हम आपको परीक्षा में बैठने की इजाज़त नहीं दे सकते,' मैडम ने कहा। 'कृपया एक तरफ हटें और अन्य छात्रों को फीस का भुगतान करने दें।' ऋतविका चुप चाप कतार से हट गयी। वह सोच में डूबी हुई थी। इस परीक्षा पे बहुत कुछ निर्भर करता था। इसके बाद उसे कोई छोटी मोटी नौकरी मिल सकती थी। वह अपने बाबा का हाथ बटा सकती थी। क्या करें अब वह? सोच सोच के उसके सिर में दर्द सा होने लगा था। किसी से पैसे उधार भी तो नहीं मांग सकती। पिछले महीने ही उसने अपनी दोस्त से कुछ पैसे लिए थे। घर जाने के अलावा कोई चारा ही नहीं था उसके पास। बेमन से अपना बैग उठा के वह स्कूल के फाटक की तरफ बड़ी। कदम भी जैसे जवाब दे रहे थे। वह सोच के आयी थी की मैडम को मना लेगी | बाबा को पता चलेगा तो वह और मायूस हो जाएंगे। 'ऋतविका! ऋत्विका, कहाँ खोयी हो ?' ऋत्विका ने पलट कर देखा तो मैडम उसे बुला रही थी। 'ओह माफ़ करना मैडम मैंने सुना नहीं था। जी कहिए।' 'तुम्हारी फीस जमा हो गयी है।' 'सच! धन्यवाद मैडम। थैंक यू इस बार भी मेरे परिस्थिति को समझने के लिए।' 'नहीं, इस बार स्कूल ने नहीं, मंजू ने भरी है तुम्हारी फीस।' 'मंजू ने…' ऋत्विका ने आसूँ भरी आंखों से मंजू की तरफ देखा। मंजू खुले आसमान को निहार रही थी। 'मंजू। धन्यवाद मंजू,' ऋत्विका बस ये कह पाई और उसने मंजू को गले से लगा लिया। मंजू ने हालांकि एक अच्छा अच्छा काम किया था, एक जरूरतमंद की मदद की थी, और ये सीख उसे माता पिता से ही मिली थी, लेकिन अब सर पर एक नयी चिंता थी। उसने अपनी मैडम से कहा था कि वो अगले दिन फ़ीस जमा कर देगी, लेकिन वह जानती थी कि यह उसके पिता के लिए भी मुश्किल होगा। वह अपना दोपहर का भोजन भी नहीं कर पाई और पूरे दिन बहुत चिंतित रही। 'मंजू, तुमने आज टिफ़िन खत्म नहीं किया?' 'मुझे भूख नहीं थी, माँ।' 'तुझे भूख नहीं थी? तुम तो हमेशा भोजन के लिए तैयार रहती हो? ठीक है तू?' 'हाँ, ठीक हूँ। मुझे सच में भूख नहीं थी।' 'तो अभी कुछ खा लो।' 'नहीं, मम्मी, अभी नहीं। पापा घर पर हैं क्या?' 'हाँ।' 'पापा, पापा। वह चिल्लाई।' 'क्या हुआ, बेटा ? सुना है तुमने खाना नहीं खाया,' पापा ने कहा। 'पापा, मुझसे एक गलती हो गयी है,' मंजू ने अपने पिता द्वारा पूछे गए सवाल को नज़रअंदाज़ करते हुए कहा। 'कैसी गलती?' 'मुझे फिर से अपनी परीक्षा फीस की आवश्यकता होगी।' 'क्यों? क्या आपने उसे खो दिया? मैंने आपको सावधान रहने के लिए कहा था ना? क्या आपने अपने बैग में ठीक से जांच की? क्या आपने अपने शिक्षकों को सूचित किया? वे स्कूल की तलाशी ले सकते थे।' 'नहीं, मैंने पैसे खोये नहीं नहीं पापा। किसी को दे दिए।' 'दे दिए?' पिताजी आश्चर्य से बोले 'मैंने आज ऋत्विका की फीस दे दी, पापा। उसके पिता की नौकरी चली गई है।' यह सुनकर उसके पिता कुछ देर चुप रहे। 'आप गुस्सा हो ना, पापा? सॉरी, दोबारा नहीं करूंगी।' 'अरे नहीं, बच्चे,' पिताजी धीरे से बोले। तुमने सही काम किया है। एक जरुरतमंद की मदद की है। परेशानी बस इतनी हैं की मेरा वेतन अभी आया नहीं हैं। मेरे पास कल देने के लिए पैसे नहीं हैं। पर तुम इसके बारे में चिंता मत करो, जब तूने अच्छा काम किया तो चिंता नहीं करनी चाहिए।' 'आप नाराज नहीं हैं? 'नहीं, मुझे गर्व है तुमपर।' 'मां?' 'मैं भी नाराज़ नहीं हूँ।' 'तब मुझे बहुत भूख लगी है।' मंजू ने कहा और किचन की तरफ भागी। मंजू के जाने के बाद पिताजी ने माँ की तरफ देखा। एक तरफ अपनी परवरिश पे गर्व था तो दूसरी और फीस जमा करने की परेशानी। अगले दिन सुबह मंजू उदास थी। आज फीस न दी तो उसको भी परीक्षा में बैठने नहीं मिलेगा। 'माँ, आज छुट्टी ले लूँ ?' उसने दबी आवाज़ में माँ से कहा। 'अरे क्यों? फीस का सोच रही है ना? परेशान मत हो, यह लो पैसे।' 'कहाँ से आये?' मंजू और उसके पिताजी एक साथ बोले। 'मेरी चीनी के डिब्बे से,' माँ ने कहा। 'मतलब?' 'अरे घर खर्च से बचा कर कुछ पैसे में हर महीने जमा कर लेती हूँ। ऐसे ही वक़्त के लिए।' मंजू ने माँ को कस के गले से लगा लिया। आज एक बात तो साबित हो ही गयी! 'आप दिल से कुछ अच्छा करें तो ज़िन्दगी आपको हारने नहीं देती।'