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KAMAL KANT LAL

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अपराध-बोध - The Guilt

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यह कहानी अनजाने में हुई हत्या के अपराध-बोध से मुक्ति की कहानी है. सत्या के हाथों अनजाने में गोपी की जान चली जाती है और सब यही समझते हैं कि दुर्घटना में उसकी मृत्यु हुई है. लेकिन सत्या हत्या के जुर्म के अपराध-बोध से छुटकारे के लिए गोपी के परिवार की आर्थिक सहायता करने निकलता है और गोपी के बच्चों, खुशी और रोहन को पास के एक शॉपिंग कॉम्प्लेक्स के आगे लोगों से भीख मांगता देखकर वह दुख और ग्लानि में डूब जाता है. इस परिवार को बर्बादी से बचाने और अपने किए गये गुनाह की बीस साल की सज़ा भुगतने के लिए सत्या बस्ती में आकर रहने लगता है. वह गोपी के परिवार को आर्थिक रूप से संभाल लेता है. बच्चों को पढ़ा-लिखा कर उनका जीवन बनाने का गोपी का सपना पूरा करने का सत्या पर जुनून सवार हो जाता है. लेकिन शराब के नशे और आशिक्षा में जकड़े लोगों के बीच ढंग से बच्चों की पढ़ाई नहीं हो सकती है. गोपी की पत्नी मीरा बस्ती छोड़कर जाना नहीं चाहती है. तब सत्यजीत निर्णय करता है कि वह पूरी बस्ती का ही माहौल बदल कर रख देगा. लेकिन खुशी और रोहन की पढ़ाई में कोई रुकावट आने नहीं देगा. किंतु काफी चुनौतिपूर्ण है बस्ती का माहौल बदलना. पड़ोस की सविता, शराबी पतियों से त्रस्त और शराब के कारण पतियों की अकाल मृत्यु के बाद विधवा हो गई औरतों के साथ मिलकर सत्यजीत बस्ती में महिला सशक्तिकरण का ऐसा माहौल बनाता है कि पूरी बस्ती की काया-पलट हो जाती है. शराब का ठेका बंद हो जाता है. बस्ती के अन्य बच्चे भी पढ़ाई में जुट जाते हैं. सामाजिक और आर्थिक बदलाव की झलक बस्ती में दिखने लगती है. खुशी पढ़ाई में बहुत अच्छा करती है. लेकिन रोहन का पढ़ाई में मन नहीं लगता है. वह अक्सर सत्या को यह अहसास दिलाता रहता है कि वह उसका बाप नहीं है. लेकिन सत्या अपना फर्ज़ निभाने से पीछे नहीं हटता है. एक दिन इन्जीनियर बन गए रोहन को पता चल जाता है कि सत्या ही उसके बाप का क़ातिल है. इस परिवार के साथ अपनी ज़िंदगी के चौदह साल कुर्बान करने के बाद भी क्या सत्या को अपने अपराध-बोध से मुक्ति मिल पाती है?

Who is this book for?

जो लोग हिंदी साहित्य से लगाव रखते हैं और समकालीन साहित्य पढ़ते हैं, उन्हें इस पुस्तक में एक ऐसे व्यक्ति की कहानी पढ़ने में आनंद आएगा जो अनजाने में हो गई हत्या के अपराध-बोध से मुक्ति के लिए छटपटा रहा है.

Why are you writing it?

कई बार नहीं चाहते हुए भी ग़लतियाँ हो ही जाती हैं. छोटी-मोटी ग़लतियाँ अक्सर नज़रअंदाज़ कर दी जाती हैं. लेकिन अगर ग़लती से आप के हाथों किसी की हत्या हो जाए तो? यहाँ क्षमा की कोई गुँजाईश नहीं रह जाती है.
आपकी ज़िंदगी पूरी तरह बिखर जाएगी. थाना-पुलिस, कोर्ट-कचहरी और जेल. बच्चों और परिवार का क्या होगा? सोचने से ही बदन में कंपकंपी की लहर दौड़ जाती है. काश किसी के साथ ऐसा कभी न हो.
हमारी इस कहानी में सत्या के हाथों ग़लती से गोपी की जान चली जाती है. लेकिन राहत की बात यह है कि किसी को भी हत्या का अंदेशा नहीं होता है. कोई थाना-पुलिस नहीं, कोर्ट-कचहरी का कोई चक्कर नहीं और न ही जेल जाने की नौबत.
सत्या क्या करेगा? सबकुछ भूलकर अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ जाएगा?.
लेकिन गोपी की हत्या के अपराध-बोध के कारण उसका मन नहीं छटपटाएगा? बिना सज़ा भुगते उसे अपने अपराध से मुक्ति मिल पाएगी?
तो फिर क्या सत्या अपना गुनाह कुबूल करके सज़ा भुगतने जेल चला जाएगा?
सत्या के जेल चले जाने से क्या गोपी को न्याय मिल जाएगा? गोपी के परिवार और बच्चों का क्या होगा?
सत्या आख़िर करेगा क्या?
सत्या की कहानी लिखते समय मुझे यह अहसास हुआ कि बहुत सारे लोग पूरी ज़िंदगी जाने-अनजाने की गई किसी ग़लती के अपराध-बोध के साथ जीते हैं. इससे मुक्ति की छटपटाहट में वे अक्सर अपने आपको पूरी ज़िंदगी बार-बार दंडित करते रहते हैं. लेकिन फिर भी छुटकारा नहीं मिल पाता है.
लेकिन छुटकारे का कोई तो उपाय होगा. कोई तो कीमत होगी.
सत्या का भी कुछ ऐसा ही हाल है. लेकिन उसने ठान लिया है कि वह अपने अपराध-बोध से छुटकारा पाकर ही रहेगा. सत्या के साथ मैं भी चल पड़ा हूँ यह देखने के लिए कि अपने छुटकारे के लिए वह कौन सी कीमत चुकाता है और अंत में उसे छुटकारा मिल पाता भी है या नहीं. आप भी बन सकते हैं हमारे हमसफर.