Autho Publication
_JeKtHSHAlOJ6CJ70OM3gZ0A2_hyqnNI.jpg
Author's Image

by

Vicky Gupta

View Profile

Pre-order Price

199.00

Includes

Author's ImagePaperback Copy

Author's ImageShipping

Pre-Order Now

Chapter 1 :

फिक्र

जया और नरेश ने अपने बच्चों के पालन-पोषण में कहीं कोई कमी नहीं छोडी। बिहार के छोटे से गांव में रहने के बावजूद बच्चों को शहर की हर सुख-सुविधाओं से परिचित करवाया। चाहे वह रंगीन टी.वी की बात हो या फिर स्मार्टफोन की बच्चों की हर जिद को पूरी करना मानो उनकी ड्यूटी हो, बच्चों ने इधर मांग की और उधर मांग पूरी हो गई। अभिनव और पिंकी वाक्य में काफी खुशनसीब थे, जिन्हें ऐसे माता-पिता मिले। मगर फिर भी अभिनव घर का चहेता था ।उसके घर में आते ही घर में मानो रौनक सी आ जाती थी। पता नहीं क्यों, मगर अभिनव की घर में तनिक भी गैरमौजूदगी जया के फिक्र को बढ़ा देती थी, आख़िर मां जो थी। और अभिनव की बात करे तो जनाब को घर में मन ही कहां लगता था। बस जनाब को दिनभर खेलने का बुखार चढ़ा रहता था। अभिनव ने पिछले महीने ही बारवीं की परीक्षा दी थी मगर उसका बचपना अभी भी जस का तस बना हुआ था। जया और नरेश के लाड-प्यार ने उसके बचपने को और बढ़ा दिया था। पिंकी अभिनव से छोटी जरूर थी मगर उसकी बातें बड़ो जैसी थी। उसका भी अभिनव से काफी लगाव था। इन दोनों कि शरारतें पूरे गांव भर में मशहूर थी।कभी इनकी शरारतों के उलाहने जया को गांव के लोगो द्वारा सुनने को मिलते तो कभी इन दोनों की यहीं शरारतें जया के मुस्कान का कारण बनती। दोनों भाई-बहन शरारती जरूर थे मगर दोनों पढ़ाई में भी काफी होनहार थे। अभिनव घरवालों के सामने अपना बचपना जरुर दिखाता था, लेकिन अपने आगे के भविष्य को लेकर वह भी काफी चिंतित रहता था। परिणाम आने के हर घटते दिन के साथ उसकी ये चिंता और भी गंभीर होती जा रही थी। वह कभी बिहार में रहकर ही अपनी आगे की पढ़ाई पूरी करने की सोचता तो कभी दिल्ली जाकर वहां पढ़ने की सोचता। उसका यह असमंजस उसे और भी परेशान करता था। आज अभिनव के बारवी का परिणाम आने वाला था मगर जनाब की बात करें तो जनाब अभी तक सो ही रहे थे। मगर घरवाले काफी परेशान थे। और जब जनाब उठे तो उनको इस बात की सुध ही नहीं थी कि आज उनका परिणाम आने वाला है। उठते के साथ ही उसने पिंकी को बुलाया और पूछा,“ आज इतनी खामोशी क्यों है घर में”। पिंकी ने अपनी त्योरियों को चढ़ाते हुए पूछा,“तुम्हे सच में नही मालूम,आज क्या है?” अभिनव ने बड़ी ही मासूमियत के साथ गर्दन हिला दिया। पिंकी का गुस्सा और भी बढ़ गया और उसने चिल्लाते हुए बताया,“ आज तुम्हारे बारवीं का परिणाम आने वाला है! भैया नींद से जागो” ।अचानक अभिनव ने अपना आंख मला और भौचक्क सा होकर बैठ गया तथा घड़ी की ओर निहारने लगा और पिंकी को अपना फोन लाने को कहा। पिंकी ने तुरंत फोन लाकर अभिनव के सामने रख दिया। अभिनव ने तुरंत नेट पर अपना परिणाम चेक किया और परिणाम देखते के साथ वह खामोश सा हो गया । पिंकी के बार- बार परिणाम पूछे जाने पर उसने बताया कि वह अच्छे नंबरों के साथ पास हो गया है। पिंकी ने तुरंत यह खुशखबरी अपनी मां को सुनाया ,जया अभिनव की इस कामयाबी से फूले ना समायी और तुरंत अभिनव को गले से लगा लिया तथा उसके माथे को चूमने लगी, पिंकी भी तुरंत अपनी मां से लिपट गई। जया ने नरेश को आवाज लगाते हुए,“ अरे सुनते हो अब तो मोहल्ले में मिठाई बंटवा ही दो”। नरेश ने तुरंत पूछा,“ क्यों ?क्या हुआ है।“ जया ने कहा ,“अपना अभिनव पास हो गया है।“ नरेश ने तुरंत पूरे मोहल्ले में खुशी के मारे मिठाई बंटवा दिया। अभिनव अपने परिणाम काफी संतुष्ट था तथा उसे नंबर भी अच्छे मिले थे लिहाजा वह दिल्ली जाकर आगे की पढ़ाई दिल्ली विश्वविद्यालय से करना चाहता था। अपनी इस इच्छा को उसने पिता के सामने रखा ,शुरू में पिता ने थोड़ी हिचकिचाहट जरुर जताई मगर हां कर दिया। मगर अभिनव यह भी जानता था कि अगर उसने मां से बाहर जाकर पढ़ने की बात कही तो वह साफ मना कर देगी। मगर उसने फिर भी जया के सामने अपने बाहर जाकर पढ़ने की बात कही और उसे जवाब भी उसके अनुमान के अनुसार ही मिला जया ने साफ इनकार कर दिया। आखिर वह मां जो थी अपने बच्चे की फिक्र कैसे न करती? ऐसा नहीं था कि नरेश अभिनव की फिक्र नहीं करता था मगर वह अभिनव में खुद को देखता था और वह अभिनव की इच्छाओं को अपना बना लेता था तथा उसे पूरा करने का हर मुमकिन प्रयास करता था। लिहाजा उसने जया को खूब समझाया और अंतत: जया मान गयी। सुबह होते ही अभिनव दिल्ली जाने की तैयारियां करने लगा ।जया और पिंकी का उदास चेहरा उसे भी मायूस कर रहा था मगर उसने खुद को थामे रखा। आखिरकार अभिनव मां तथा पिता का आशीर्वाद लेते हुए दिल्ली की ओर निकल पड़ा। पिता की आंखें बेटे के कामयाबी के अरमानों से भरी पड़ी थी ,जो उसे खुद से बेटे को अलग करने के लिए मजबूर कर रही थी। माँ ने केवल यह कहते हुए बेटे को विदा किया कि ,“बेटा !फोन करते रहना।” परिवार के अरमानों एवं उनके सपनों सच करने के लिए वह दिल्ली आ गया तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस महाविद्यालय में दाखिला प्राप्त कर लिया तथा रहने की बात करें तो यही नजदीक में कमला नगर में PG ले लिया। दिल्ली की आवो हवा उसके अनुकूल बिल्कुल भी ना थी। ऐसी आजादी का अनुभव शायद उसने पहले कभी नहीं किया था। शुरू में उसके लिए इस परिस्थिति में खुद को ढाल पाना काफी मुश्किल था लिहाजा वह रोज शाम माँ से फोन पर बात करके खुद को तसल्ली दे दिया करता था। मगर समय के साथ उसने खुद को इस परिस्थिति में ढाल लिया था। वह भी अब बाकियों की तरह बेफिक्री की राह पर निकल पड़ा था । कॉलेज में उसकी मुलाकात नए-नए मित्रों से हुई। मित्रों की बात करे तो अधिकतर रिहायशी परिवार से ताल्लुक रखते थे मगर अभिनव की बात करें तो उसके परिवार की स्थिति उतनी भी अच्छी नहीं थी। मगर अभिनव अपने दोस्तों से इतना जुड़ चुका था कि वह अपने और दोस्तों के बीच पैसे को नहीं आने देना चाहता था। उधर जया की बात करें तो उसका फिक्र अभिनव को लेकर दिनों -दिन बढ़ता ही जा रहा था। क्योंकि पहले अभिनव प्रतिदिन फोन किया करता था मगर अब फोन आने की रफ्तार चिट्ठियों के आने की रफ्तार से भी धीमी पड़ने लगी थी। अब अभिनव महीने में एक से दो बार ही घर पर फोन करता था। वह भी केवल पैसों की मांग के लिए अभिनव का इस तरह का बर्ताव जया के समझ से बिल्कुल ही पड़े था। मगर नरेश समझता था कि पढ़ाई में व्यस्त होने के कारण वह ऐसा व्यवहार कर रहा है। अभिनव काफी अच्छा कलाकार था। लिहाजा रामजस कॉलेज की नाटक सोसाइटी में शामिल हो गया उसमें एक कुशल कलाकार के गुण भली-भांति सम्मिलित थे। उसे नाटक में भूमिका अदा करने से बहुत सुकून मिलता था। वह नाटक करने में इतना डूब गया था कि उसने अपने विषय से जुड़े लेक्चर भी अटेंड करना कम कर दिया था। नाटक के दौरान ही उसकी मुलाकात रचना नाम की लड़की से हुई ,जो खुद रामजस कॉलेज में पढ़ा करती थी। पहली नजर में ही अभिनव उसकी और आकर्षित हो गया और जब जान- पहचान का सिलसिला आगे बढ़ा तो अभिनव को एहसास हुआ कि उसके बाकी दोस्तों की तरह ही रचना भी काफी रिहायशी परिवार से ताल्लुक रखती थी। मगर अभिनव को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। अब बस वह रचना से बात करने का मौका तलाशता रहता था। रचना अभिनव के लिए किसी चुंबक से कम नहीं थी जिसे देखते ही वह उसकी ओर खींचा चला जाता था। रचना भी अभिनव को नाटक करता देख काफी खुश होती थी। रचना से मुलाकात के बाद अभिनव अपनी पढ़ाई से बिल्कुल ही भटक चुका था। वह अपने सभी सपनों अरमानों को भूल चुका था जिन्हें लेकर वह अपने गांव से निकला था ।अब उसके लिए यह सपने कोई मायने नहीं रखते थे। उसके भीतर दिल्ली की आजादी का नशा कुछ ऐसा चढ़ा था कि उसे किसी बात की सुध- बुध नहीं रह गई थी। मानो अब रचना ही उसके लिए सब कुछ हो। धीरे- धीरे रचना भी उसकी और खींचती चली गई।अब दोनो अधिकतर वक्त एक- दूसरे के साथ बिताने लगे थे। कभी दोनों फिल्म देखने कमला नगर निकल पड़ते तो कभी हडसन लेन तो कभी सुदामा की टी स्टॉल पर चाय की चुस्की लेते दिख जाते थे। लड़का होने के नाते यह घूमने- फिरने का सारा खर्च अभिनव को ही उठाना पड़ता था। मगर इसके पीछे भी उसका अपना स्वार्थ छिपा हुआ था। वह मनो-मन रचना को चाहने लगा था मगर वह अपने प्यार का इजहार करने से डरता था। क्योंकि उसके ऐसा करने से यदि रचना ने दोस्ती तोड़ ली तो फिर उसका गुजारा कैसे चलेगा।अभी काम से कम वह उसके साथ तो है। रचना की दिल की बात जानने के लिए वह खुद को और समय देना चाहता था मगर पैसों की तंगी उसे परेशान कर रही थी और अभी वह घर वालों से पैसों की मांग भी नहीं कर सकता था। क्योंकि 2 दिन पहले ही तो घर वालों ने पैसे भेजे थे जो अब खर्च हो चुके थे। मगर महीना चलाने के लिए अब कहीं न कहीं से तो पैसों का बंदोबस्त करना ही था। लिहाजा उसने रात में होटलों पार्ट टाइम काम करना शुरु कर दिया और उसके इस कदम का नतीजा उसके परिणाम पर भी देखने को मिला जिसके अनुसार वह पहले सेमेस्टर को सफलतापूर्वक पार नहीं कर पाया अब उसके सामने यह बड़ा सवाल आ पडा कि वह यह परिणाम किस मुंह से अपने घर वालों को बताएगा?लिहाजा उसने पहले सेमेस्टर में फेल हो जाने की बात सबसे पहले रचना को बताना उचित समझा। उसे उम्मीद थी की रचना उसका इस परिस्थिति में जरूर साथ देगी। उसके उम्मीद के मुताबिक ही शुरू में रचना ने उसका साहस जरूर बढ़ाया। मगर धीरे-धीरे वह अभिनव से कटने लगी। दोनों की मुलाकातें भी कम होने लगी। रचना ने अभिनव से फोन पर बात करना भी कम कर दिया। इस परिस्थिति में रचना को खुद से दूर जाता देख अभिनव यह समझ चुका था कि रचना उससे कभी प्यार करती ही नहीं थी। मगर अभिनव अभी भी उससे उतना ही प्यार करता था जितना कि पहले करता था। परीक्षा तथा प्यार दोनों में हार के बाद अभिनव बुरी तरह टूट चुका था। परीक्षा में फेल हो जाने से ज्यादा गम से इस बात का था कि इस परिस्थिति में रचना ने उसका साथ छोड़ दिया था। इतना सब हो जाने के बाद उसे अब अपनी जिंदगी निरर्थक नजर आ रही थी। जिसे वह खत्म कर देना चाहता था। अपनी चिंताओं से लड़ने के लिए उसने ड्रग्स का सहारा लेना शुरु कर दिया, नशे की बुरी लत पालने लगा। दिनों- दिन तक खुद को घर में कैद रखने लगा। उधर घरवाले उसके फोन ना उठाए जाने से काफी परेशान हो रहे थे। आखिरकार उन्होंने दिल्ली आकर अभिनव से मिलने का निश्चय कर लिया। दिल्ली पहुंच जब जया एवं नरेश ने अभिनव हाल देखा तो समझ गए कि उसके जीवन में कुछ भी सही नही चल रहा है।घर में शराब की बोतल बिखरी पड़ी थी। सामान इधर- उधर बिखरा पड़ा था। घर के एक कोने में अभिनव बेसुध- सा नजर आ रहा था। उसकी आंखों से आंसुओ की धारा बह रही थी। अपने कलेजे के टुकड़े को इस हाल में पाकर जया भी बिलख-बिलख के रोने लगी और तुरंत अभिनव को अपने गले से लगा लिया तथा अपने आंचल से उसकी आंसुओ को पोछने लगी।बहन पिंकी भी अभिनव से लिपटी हुई थी। नरेश भी अपने बिखरे हुए अरमानों को देख खुद को थामे ना रखा सका और रोने लगा।एक बार फिर अपनों के बीच खुद को पाकर अभिनव का भी हौसला बढ़ने लगा उसने जया को सारी बात बताई अभिनव द्वारा अपनी सच्चाई बताए जाने पर जया समझ गई कि अभिनव अपने किए पर वाक्य में काफी शर्मिंदा था तथा उसको अपनी गलती का एहसास हो चुका है। मगर इतना सब हो जाने के बाद जया का मन अभिनव को एक बार फिर से खुद को अलग करने का नहीं कर रहा था मगर नरेश उसे खुद को साबित करने का एक और मौका देना चाहता था। नरेश और जया अपने अरमानों को हारकर पुनः वापिस अपने गांव लौट चुके थे। मां- बाप को खुद से दूर जाता देख अभिनव समझ गया था कि यदि वह अपने पथ से ना भटका होता तो शायद आज वह इस परिस्थिति में खुद को अकेला ना पाता।उसे अपने आप को साबित करने का एक मौका मिला था। जिसे वह अब बर्बाद नहीं होने देना चाहता था। उसने फिर से अपने जीवन की बुनियाद गढ़नी शुरू की। मगर अंदर से खोखला हो जाने के कारण नई इमारत में उतनी जान नजर नहीं आ रही थी।अब अभिनव अपने पैरों पर जरूर खड़ा था। मगर उसका मन अभी भी उसके बीते पलो को कुरेद रहा था। उसने फिर से खुद को एक कलाकार के रुप में विकसित किया। उसकी जिंदगी एक बार फिर से ट्रैक पर दौड़ने लगी थी। मगर जिंदगी को कुछ और ही मंजूर था। कुछ महीनो बाद ही उसकी मुलाकात फिर से रचना से हुई मगर इस बार अभिनव ने उससे अपनी नजरों को फेरना ही उचित समझा। दोनों को एक बार फिर एक नाटक में साथ काम करने का मौका मिला। जिसमें अभिनेता(अबिनाव), अभिनेत्री(रचना) से पहली ही मुलाकात में प्यार कर बैठा। मगर कभी भी प्यार का इजहार अभिनेत्री से नहीं कर पाया। तथा अभिनेता के परीक्षा में फेल हो जाने के पर अभिनेत्री उसका साथ धीरे-धीरे छोड़ती चली गई। उसने कभी भी अभिनेता कि उसके प्रति प्यार को महसूस ही नहीं किया। इतना सब हो जाने के बाद अभिनव द्वारा रचना के साथ एक बार फिर काम कर पाना आसान नहीं था। वह भी ऐसे नाटक में जो उसे उसके अतीत में ले जा रही थी। जहां से बाहर निकलने में उसे महीनों लग गए थे। निर्देशक द्वारा बहुत समझाने के बाद अभिनव इस नाटक को करने के लिए सहमत हो गया। अपनी वास्तविकता को पर्दे पर प्रदर्शित करना अभिनव के लिए आसान नहीं था। उसने इस नाटक में एक उत्कृष्ट दर्जे के कलाकार की तरह काम किया तथा सभी को उसके इस नाटक में किया गया अभिनय बहुत पसंद आया। उसके इस अभिनय के लिए उसे दिल्ली विश्वविद्यालय की ओर से उत्कृष्ट कलाकार का सम्मान भी प्रदान किया गया। रचना भी अभिनव की जिंदगी को एक बार फिर से महसूस कर के समझ गई थी कि उस समय उसने जो भी किया वह बिल्कुल भी सही नहीं था। वह एक बार फिर अभिनव की जिंदगी में लौटना चाहती थी। उसने अभिनव से माफी मांगी ,अभिनव ने भी उसका बड़े दिल के साथ अपनी जिंदगी में फिर से स्वागत किया। जया और नरेश भी अपने बेटे के कामयाबी से काफी खुश थे। उन्होंने ने भी अभिनव को माफ कर दिया।